कौड़ियाला घाट गुरुद्वारा

जिला खीरी के ग्राम तिकुनियां में स्थित कौड़ियाला घाट गुरुद्वारा श्री गुरु नानक देव जी से जुड़ा हुआ स्थान है। यह सिखों का प्रमुख धार्मिक स्थल है व उत्तर प्रदेश राज्य में मौजूद प्रमुख गुरुद्वारों में से एक है। सिख धर्म में इस गुरुद्वारे का बहुत महत्व है, साथ ही यह हिंदुओं के लिये भी आस्था का विशेष स्थान रखता है। सिखों के पहले गुरु, श्री गुरु नानक देव जी अपनी तीसरी उदासी की यात्रा के दौरान काठमांडू जाते समय सन् 1514 ईस्वी में यहां आए थे और उन्होंने यहां रात्रि विश्राम किया था ।

जब गुरु जी अपने शिष्यों भाई बाला और मर्दाना जी के साथ इस स्थान पर पहुंचे तो अँधेरा हो चुका था और गुरु जी ने इस स्थान पर मौजूद एक गाँव में रात्रि विश्राम करना चाहा लेकिन कोई भी ग्रामीण गुरु जी और उनके साथियों का आतिथ्य सत्कार करने को तैयार नहीं हुए और ग्रामीणों ने गुरु जी को गाँव से दूर एक कोढ़ी की कुटिया में जाने को कहा; पूर्व में ग्रामीणों ने उस कोढ़ी के शरीर से अत्यधिक दुर्गंध आने के कारण उसे गाँव से दूर खदेड़ दिया था तब से वो कोढ़ी गाँव से दूर नदी के किनारे एक झोपडी बना कर रहता था। गाँव का कोई भी व्यक्ति की दुर्गंध व कोढ़ की छूआ-छूत के डर के कारण उसके पास नहीं जाता था वे जैसे-तैसे अपना जीवन काट रहा था, गुरु जी ने रात्रि विश्राम का कोई साधन न देख और आस-पास में कोई अन्य गाँव न होने के कारण एवं रात्रि होते देख गुरु जी ने अपने दोनों शिष्यों के साथ उसी कोढ़ी की कुटिया में रात बिताई जहाँ पर उन्होंने कीर्तन और ध्यान किया।

गुरु जी द्वारा गायन किये गए दिव्य कीर्तन से उस कोढ़ी को बहुत सुकून मिला, जो शायद कई रातों के बाद चैन की नींद सोया था। सुबह उस कोढ़ी ने गुरु जी को कोई ईश्वरीय शक्ति समझ कर गुरु जी से बीमारी को ठीक करने और मदद करने के लिए प्रार्थना की, गुरु जी ने उस कोड़ी को प्यार से पास बुलाया और पास में बह रही नदी (जिसे आज घाघरा और नेपाल में कर्णाली कहा जाता है) में स्नान करने को कहा; गुरु जी के आशीर्वाद से कोढ़ी ने उस नदी में स्नान किया और उसका रोग ठीक हो गया, यह सुनते ही वो ग्रामीण जिन्होंने कल रात गुरु जी को आश्रय देने से मना कर दिया था। गुरु जी के पास आ गए और गुरु जी से क्षमा याचना करने लगे। गुरु जी ने ग्रामीणों को आशीर्वाद देते हुए यह समझाया कि आये अतिथियों व जरूरतमंदों को आश्रय व भोजन देना चाहिए न कि उन्हें दुत्कार कर घर से भगा देना चाहिए। गुरु जी ने ग्रामीणों को यात्रियों के रुकने के लिए एक विश्राम गृह बनाने के लिए कहा और कहा कि विश्रामगृह में आए मेहमान व जरूरतमंद का सेवा सत्कार कर उन्हें भोजन करवाया करो। आज इसी स्थान पर गुरुद्वारा साहिब स्थित हैं। उसके उपरांत गुरु जी नदी पार कर नेपाल राज्य की तरफ चले गए।

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